चार क़ुल हिंदी में

सूरह काफ़िरून, सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़ और सूरह नास

  • 4 सूरतें
  • 21 आयतें

चार क़ुल क़ुरआन की वे चार छोटी सूरतें हैं जो शब्द "क़ुल" (कह दीजिए) से शुरू होती हैं: सूरह काफ़िरून (109), सूरह इख़लास (112), सूरह फ़लक़ (113) और सूरह नास (114)। इनमें कुल 21 आयतें हैं।

इस पन्ने पर आप चारों क़ुल अरबी पाठ, मौलाना अज़ीज़ुल हक़ उमरी के हिंदी तर्जुमे और रोमन उच्चारण के साथ पढ़ सकते हैं और हर सूरह की तिलावत सुन सकते हैं।

सूरह काफ़िरून سورة الكافرون

इनकार करने वाले · 6 आयतें · पूरी सूरह पढ़ें

0:55

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْكَـٰفِرُونَ۝١

    Qul ya ayyuha alkafiroona

    (ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!

  2. لَآ أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ۝٢

    La aʿbudu ma taʿbudoona

    मैं उसकी इबादत नहीं करता, जिसकी तुम इबादत करते हो।

  3. وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ۝٣

    Wala antum ʿabidoona ma aʿbudu

    और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

  4. وَلَآ أَنَا۠ عَابِدٌ مَّا عَبَدتُّمْ۝٤

    Wala ana ʿabidun ma ʿabadtum

    और न मैं उसकी इबादत करने वाला हूँ, जिसकी इबादत तुमने की है।

  5. وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ۝٥

    Wala antum ʿabidoona ma aʿbudu

    और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

  6. لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ۝٦

    Lakum deenukum waliya deeni

    तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।1

    टिप्पणियाँ
    [1] (1-6) पूरी सूरत का भावार्थ यह है कि इस्लाम में वही ईमान (विश्वास) मान्य है, जो पूर्ण तौह़ीद (एकेश्वर्वाद) के साथ हो, अर्थात अल्लाह के अस्तित्व तथा गुणों और उसके अधिकारों में किसी को साझी न बनाया जाए। क़ुरआन की शिक्षानुसार जो अल्लाह को नहीं मानता, और जो मानता है परंतु उसके साथ देवी-देवताओं को भी मानात है, तो दोनों में कोई अंतर नहीं। उसके विशेष गुणों को किसी अन्य में मानना उसको न मानने ही के बराबर है और दोनों ही काफ़िर हैं। (देखिए : उम्मुल किताब, मौलाना आज़ाद)

सूरह इख़लास سورة الإخلاص

ख़ुलूस · 4 आयतें · पूरी सूरह पढ़ें

0:22

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ۝١

    Qul huwa Allahu ahadun

    (ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।1

    टिप्पणियाँ
    [1] आयत संख्या 1 में 'अह़द' शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है, उसके अस्तित्व एवं गुणों में कोई साझी नहीं है। यहाँ 'अह़द' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि वह अकेला है। वह वृक्ष के समान एक नहीं है जिसकी अनेक शाखाएँ होती हैं। आयत संख्या 2 में 'समद' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है अब्रण होना। अर्थात जिसमें कोई छिद्र न हो जिससे कुछ निकले, या वह किसी से निकले। और आयत संख्या 3 इसी अर्थ की व्याख्या करती है कि न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।
  2. ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ۝٢

    Allahu alssamadu

    अल्लाह बेनियाज़ है।

  3. لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ۝٣

    Lam yalid walam yooladu

    न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

  4. وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌۢ۝٤

    Walam yakun lahu kufuwan ahadun

    और न कोई उसका समकक्ष है।2

    टिप्पणियाँ
    [2] इस आयत में यह बताया गया है कि उसकी प्रतिमा तथा उसके बराबर और समतुल्य कोई नहीं है। उसके कर्म, गुण और अधिकार में कोई किसी रूप में बराबर नहीं। न उसकी कोई जाति है न परिवार। इन आयतों में क़ुरआन उन विषयों को जो लोगों के तौह़ीद से फिसलने का कारण बने, उसे अनेक रूप में वर्णित करता है। और देवियों और देवताओं के विवाहों और उन के पुत्र और पौत्रों का जो विवरण देव मालाओं में मिलता है, क़ुरआन ने उसका खंडन किया है।

सूरह फ़लक़ سورة الفلق

सुबह का उजाला · 5 आयतें · पूरी सूरह पढ़ें

0:34

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ۝١

    Qul aʿoothu birabbi alfalaqi

    (ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।

  2. مِن شَرِّ مَا خَلَقَ۝٢

    Min sharri ma khalaqa

    उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की।

  3. وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ۝٣

    Wamin sharri ghasiqin itha waqaba

    तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए।1

    टिप्पणियाँ
    [1] (1-3) इनमें संबोधित तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को किया गया है, परंतु आपके माध्यम से पूरे मुसलमानों के लिए संबोधन है। शरण माँगने के लिए तीन बातें ज़रूरी हैं : (1) शरण माँगाना। (2) जो शरण माँगता हो। (3) जिसके भय से शरण माँगी जाती हो और अपने को उससे बचाने के लिए दूसरे की सुरक्षा और शरण में जाना चाहता हो। फिर शरण वही माँगता है, जो यह सोचता है कि वह स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता। और अपनी रक्षा के लिए वह ऐसे व्यक्ति या अस्तित्व की शरण लेता है जिसके बारे में उसका विश्वास होता है कि वह उसकी रक्षा कर सकता है। अब स्वभाविक नियमानुसार इस संसार में सुरक्षा किसी वस्तु या व्यक्ति से प्राप्त की जाती है, जैसे धूप से बचने के लिये पेड़ या भवन आदि की। परंतु एक खतरा वह भी होता है जिससे रक्षा के लिए किसी अनदेखी शक्ति से शरण माँगी जाती है, जो इस विश्व पर राज करती है। और वह उसकी रक्षा अवश्य कर सकती है। यही दूसरे प्रकार की शरण है, जो इन दोनों सूरतों में अभिप्रेत है। और क़ुरआन में जहाँ भी अल्लाह की शरण लेने की चर्चा है उसका अर्थ यही विशेष प्रकार की शरण है। और यह तौह़ीद पर विश्वास का अंश है। ऐसे ही शरण के लिए विश्वासहीन देवी-देवताओं इत्यादि को पुकारना शिर्क और घोर पापा है।
  4. وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّـٰثَـٰتِ فِى ٱلْعُقَدِ۝٤

    Wamin sharri alnnaffathati fee alʿuqadi

    तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

  5. وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ۝٥

    Wamin sharri hasidin itha hasada

    तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।2

    टिप्पणियाँ
    [2] (4-5) इन दोनों आयतों में जादू और हसद (ईर्ष्या) की बुराई से अल्लाह की शरण में आने की शिक्षा दी गई है। और हसद ऐसा रोग है जो किसी व्यक्ति को दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए तैयार कर देता है। और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर भी जादू, हसद ही के कारण किया गया था। यहाँ ज्ञातव्य है कि इस्लाम ने जादू को अधर्म कहा है जिससे इनसान के परलोक का विनाश हो जाता है।

सूरह नास سورة الناس

इंसान · 6 आयतें · पूरी सूरह पढ़ें

0:51

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ۝١

    Qul aʿoothu birabbi alnnasi

    (ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।

  2. مَلِكِ ٱلنَّاسِ۝٢

    Maliki alnnasi

    लोगों के बादशाह की।

  3. إِلَـٰهِ ٱلنَّاسِ۝٣

    Ilahi alnnasi

    लोगों के सत्य पूज्य की।1

    टिप्पणियाँ
    [1] (1-3) यहाँ अल्लाह को उसके तीन गुणों के साथ याद करके उसकी शरण लेने की शिक्षा दी गई है। एक उसका सब मानवजाति का पालनहार और स्वामी होना। दूसरे उसका सभी इनसानों का अधिपति और शासक होना। तीसरे उसका इनसानों का सत्य पूज्य होना। भावार्थ यह है कि (मैं) उस अल्लाह की शरण माँगता हूँ जो इनसानों का पालनहार, शासक और पूज्य होने के कारण उनपर पूरा नियंत्रण और अधिकार रखता है। जो वास्तव में, उस बुराई से इनसानों को बचा सकता है, जिससे वे स्वयं बचने और दूसरों को बचाने में अक्षम हैं, उसके सिवा कोई है भी नहीं जो शरण दे सकता हो।
  4. مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ۝٤

    Min sharri alwaswasi alkhannasi

    वसवसा डालने वाले, पीछे हट जाने वाले की बुराई से।

  5. ٱلَّذِى يُوَسْوِسُ فِى صُدُورِ ٱلنَّاسِ۝٥

    Allathee yuwaswisu fee sudoori alnnasi

    जो लोगों के दिलों में वसवसे डालता है।

  6. مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ۝٦

    Mina aljinnati wa alnnasm

    जिन्नों और इनसानों में से।2

    टिप्पणियाँ
    [2] (4-6) आयत संख्या 4 में 'वसवास' शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है दिलों में ऐसी बुरी बातें डाल देना कि जिसके दिल में डाली जा रही हों उसे उसका ज्ञान भी न हो। और इसी प्रकार आयत संख्या 4 में 'ख़न्नास' का शब्द प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है सुकड़ जाना, छुप जाना, पीछे हट जाना, धीरे-धीरे किसी को बुराई के लिए तैयार करना आदि। अर्थात दिलों में भ्रम डालने वाला, और सत्य के विरुद्ध मन में बुरी भावनाएँ उत्पन्न करने वाला। चाहे वह जिन्नों में से हो, अथवा मनुष्यों में से हो। इन सब की बुराइयों से हम अल्लाह की शरण लेते हैं, जो हमारा स्वामी और सच्चा पूज्य है।

फ़ज़ीलत और फ़ायदे

  • नबी ﷺ हर रात सोने से पहले दोनों हथेलियाँ मिलाकर उनमें फूँकते, सूरह इख़लास, सूरह फ़लक़ और सूरह नास पढ़ते और जहाँ तक हो सकता अपने शरीर पर हाथ फेरते। यह तीन बार करते।

    सहीह बुख़ारी 5017 · Source सहीह

  • नबी ﷺ ने एक सहाबी को सिखाया कि सुबह और शाम तीन-तीन बार सूरह इख़लास और मुअव्वज़तैन (सूरह फ़लक़ और सूरह नास) पढ़ा करो, ये तुम्हें हर चीज़ से काफ़ी होंगी।

    सुनन अबी दाऊद 5082; जामे तिर्मिज़ी 3575 · Source हसन (अल्बानी)

  • नबी ﷺ ने नौफ़ल रज़ियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया कि सूरह काफ़िरून पढ़ो और उसके ख़त्म पर सो जाओ, क्योंकि यह शिर्क से बराअत (अलग होना) है।

    सुनन अबी दाऊद 5055 · Source सहीह (अल्बानी)

  • नबी ﷺ फ़ज्र की दो सुन्नतों में सूरह काफ़िरून और सूरह इख़लास पढ़ते थे।

    सहीह मुस्लिम 726 · Source सहीह

  • सूरह इख़लास के बारे में नबी ﷺ ने फ़रमाया कि यह एक तिहाई क़ुरआन के बराबर है।

    सहीह बुख़ारी 5013 · Source सहीह

Hadith references link to the collection so you can check them. Gradings are those of the scholars named; where scholars differ, both gradings are shown.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चार क़ुल कौन-सी सूरतें हैं?

सूरह काफ़िरून (109), सूरह इख़लास (112), सूरह फ़लक़ (113) और सूरह नास (114)।

इन्हें चार क़ुल क्यों कहते हैं?

क्योंकि चारों सूरतें शब्द "क़ुल" से शुरू होती हैं, जिसका मतलब है "कह दीजिए"।

चार क़ुल कब पढ़े जाते हैं?

सोने से पहले: नबी ﷺ सूरह इख़लास, फ़लक़ और नास पढ़कर हथेलियों में फूँकते और शरीर पर फेरते थे (सहीह बुख़ारी 5017), और सूरह काफ़िरून पढ़कर सोने की तालीम दी (सुनन अबी दाऊद 5055)। सुबह और शाम: सूरह इख़लास, फ़लक़ और नास तीन-तीन बार (सुनन अबी दाऊद 5082)।

स्रोत

  • Arabic text: Tanzil Quran Text (Uthmani) (Tanzil Project, CC BY 3.0), reproduced without changes.
  • Translation: Azizul Haq Al-Omari, from QuranEnc.com, version 1.1.5, reproduced without changes.
  • Transliteration: Tanzil.net English transliteration.
  • Recitation: Mishary Rashid Alafasy, via QuranicAudio.com and EveryAyah.com.
  • Word by word: recordings and meanings from Quran.com (Quran Foundation), played when you tap a word.
  • Madinah and IndoPak fonts (Settings): the text in those scripts and their fonts come from the Quran Foundation (Quran.com); the Madinah font is the King Fahd Glorious Quran Printing Complex's Uthmanic Hafs font.

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