سورة الجن

सूरह जिन्न हिंदी में

जिन्न

मुसहफ़

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सूरह जिन्न (الجن) क़ुरआन की 72वीं सूरह है और इसमें 28 आयतें हैं। इसके नाम का मतलब "जिन्न" है। यह मक्की सूरह है और पारा 29 में है।

इस पन्ने पर आप सूरह जिन्न का पूरा अरबी पाठ मौलाना अज़ीज़ुल हक़ उमरी के हिंदी तर्जुमे और रोमन उच्चारण के साथ आयत-दर-आयत पढ़ सकते हैं और तिलावत सुन सकते हैं।

मुकम्मल सूरह जिन्न: अरबी, हिंदी तर्जुमा और रोमन उच्चारण

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. قُلْ أُوحِىَ إِلَىَّ أَنَّهُ ٱسْتَمَعَ نَفَرٌ مِّنَ ٱلْجِنِّ فَقَالُوٓا۟ إِنَّا سَمِعْنَا قُرْءَانًا عَجَبًا۝١

    Qul oohiya ilayya annahu istamaʿa nafarun mina aljinni faqaloo inna samiʿna quranan ʿajaban

    (ऐ नबी!) कह दें : मेरी ओर वह़्य1 की गई है कि जिन्नों के एक समूह ने (मेरे क़ुरआन पढ़ने को) ध्यान से सुना। फिर उन्होंने कहा : निःसंदेह हमने एक अद्भुत क़ुरआन सुना है।

    टिप्पणियाँ
    [1] सूरतुल-अह़्क़ाफ़, आयत : 29 में इसका वर्णन किया गया है। इस सूरत में यह बताया गया है कि जब जिन्नों ने क़ुरआन सुना, तो आपने न जिन्नों को देखा और न आपको उसका ज्ञान हुआ। बल्कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को वह़्य (प्रकाशना) द्वारा इससे सूचित किया गया।
  2. يَهْدِىٓ إِلَى ٱلرُّشْدِ فَـَٔامَنَّا بِهِۦ ۖ وَلَن نُّشْرِكَ بِرَبِّنَآ أَحَدًا۝٢

    Yahdee ila alrrushdi faamanna bihi walan nushrika birabbina ahadan

    जो सीधी राह दिखाता है, तो हम उसपर ईमान ले आए और (अब) हम अपने पालनहार के साथ किसी को कभी साझी नहीं बनाएँगे।

  3. وَأَنَّهُۥ تَعَـٰلَىٰ جَدُّ رَبِّنَا مَا ٱتَّخَذَ صَـٰحِبَةً وَلَا وَلَدًا۝٣

    Waannahu taʿala jaddu rabbina ma ittakhatha sahibatan wala waladan

    तथा यह कि हमारे पालनहार की महिमा बहुत ऊँची है। उसने न (अपनी) कोई संगिनी (पत्नी) बनाई है और न कोई संतान।

  4. وَأَنَّهُۥ كَانَ يَقُولُ سَفِيهُنَا عَلَى ٱللَّهِ شَطَطًا۝٤

    Waannahu kana yaqoolu safeehuna ʿala Allahi shatatan

    तथा यह कि हमारा मूर्ख अल्लाह के बारे में सत्य से हटी हुई बात कहा करता था।

  5. وَأَنَّا ظَنَنَّآ أَن لَّن تَقُولَ ٱلْإِنسُ وَٱلْجِنُّ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا۝٥

    Waanna thananna an lan taqoola alinsu waaljinnu ʿala Allahi kathiban

    और यह कि हमने समझ रखा था कि मनुष्य और जिन्न अल्लाह पर हरगिज़ कोई झूठी बात नहीं बोलेंगे।

  6. وَأَنَّهُۥ كَانَ رِجَالٌ مِّنَ ٱلْإِنسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍ مِّنَ ٱلْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًا۝٦

    Waannahu kana rijalun mina alinsi yaʿoothoona birijalin mina aljinni fazadoohum rahaqan

    और वास्तविकता यह है कि मनुष्यों में से कुछ लोग, जिन्नों में से कुछ लोगों की शरण लिया करते थे। तो उन्होंने उन (जिन्नों) को सरकशी में बढ़ा दिया।

  7. وَأَنَّهُمْ ظَنُّوا۟ كَمَا ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَبْعَثَ ٱللَّهُ أَحَدًا۝٧

    Waannahum thannoo kama thanantum an lan yabʿatha Allahu ahadan

    और यह कि उन (इनसानों) ने गुमान किया था, जैसे कि तुमने गुमान किया था कि अल्लाह किसी को कभी नहीं उठाएगा।

  8. وَأَنَّا لَمَسْنَا ٱلسَّمَآءَ فَوَجَدْنَـٰهَا مُلِئَتْ حَرَسًا شَدِيدًا وَشُهُبًا۝٨

    Waanna lamasna alssamaa fawajadnaha muliat harasan shadeedan washuhuban

    तथा यह कि हमने आकाश को टटोला, तो उसे सख़्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया।

  9. وَأَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَـٰعِدَ لِلسَّمْعِ ۖ فَمَن يَسْتَمِعِ ٱلْـَٔانَ يَجِدْ لَهُۥ شِهَابًا رَّصَدًا۝٩

    Waanna kunna naqʿudu minha maqaʿida lilssamʿi faman yastamiʿi alana yajid lahu shihaban rasadan

    और यह कि हम उसके कई स्थानों में सुनने के लिए बैठा करते थे। परन्तु, अब जो सुनने का प्रयास करता है, वह अपने लिए एक उल्का घात में लगा हुआ पाता है।

  10. وَأَنَّا لَا نَدْرِىٓ أَشَرٌّ أُرِيدَ بِمَن فِى ٱلْأَرْضِ أَمْ أَرَادَ بِهِمْ رَبُّهُمْ رَشَدًا۝١٠

    Waanna la nadree asharrun oreeda biman fee alardi am arada bihim rabbuhum rashadan

    और यह कि हम नहीं जानते कि क्या धरती वालों के साथ किसी बुराई का इरादा किया गया है या उनके पालनहार ने उनके साथ किसी भलाई का इरादा किया है?

  11. وَأَنَّا مِنَّا ٱلصَّـٰلِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ كُنَّا طَرَآئِقَ قِدَدًا۝١١

    Waanna minna alssalihoona waminna doona thalika kunna taraiqa qidadan

    और यह कि हममें से कुछ सदाचारी हैं तथा हममें से कुछ इसके अलावा हैं। हम विभिन्न तरीक़ों पर हैं।

  12. وَأَنَّا ظَنَنَّآ أَن لَّن نُّعْجِزَ ٱللَّهَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَن نُّعْجِزَهُۥ هَرَبًا۝١٢

    Wanna thananna an lan nuʿjiza Allaha fee alardi walan nuʿjizahu haraban

    तथा यह कि हमें विश्वास हो गया कि निःसंदेह हम धरती में अल्लाह को कदापि विवश नहीं कर सकेंगे और न ही उसे भागकर कभी विवश कर सकेंगे।

  13. وَأَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا ٱلْهُدَىٰٓ ءَامَنَّا بِهِۦ ۖ فَمَن يُؤْمِنۢ بِرَبِّهِۦ فَلَا يَخَافُ بَخْسًا وَلَا رَهَقًا۝١٣

    Waanna lamma samiʿna alhuda amanna bihi faman yumin birabbihi fala yakhafu bakhsan wala rahaqan

    तथा यह कि जब हमने मार्गदर्शन की बात सुनी, तो उसपर ईमान ले आए। अब जो कोई अपने पालनहार पर ईमान लाएगा, तो वह न किसी हानि से डरेगा और न किसी अत्याचार से।

  14. وَأَنَّا مِنَّا ٱلْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا ٱلْقَـٰسِطُونَ ۖ فَمَنْ أَسْلَمَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ تَحَرَّوْا۟ رَشَدًا۝١٤

    Waanna minna almuslimoona waminna alqasitoona faman aslama faolaika taharraw rashadan

    और यह कि हममें से कुछ आज्ञाकारी हैं और हममें से कुछ अत्याचारी हैं। फिर जो आज्ञाकारी हो गया, तो वही लोग हैं जिन्होंने सीधा रास्ता खोजा।

  15. وَأَمَّا ٱلْقَـٰسِطُونَ فَكَانُوا۟ لِجَهَنَّمَ حَطَبًا۝١٥

    Waama alqasitoona fakanoo lijahannama hataban

    तथा जो अत्याचारी हैं, तो वे जहन्नम का ईंधन होंगे।

  16. وَأَلَّوِ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ عَلَى ٱلطَّرِيقَةِ لَأَسْقَيْنَـٰهُم مَّآءً غَدَقًا۝١٦

    Waallawi istaqamoo ʿala alttareeqati laasqaynahum maan ghadaqan

    और यह (वह़्य की गई है) कि यदि वे सीधी राह पर क़ायम रहते, तो हम उन्हें अवश्य भरपूर जल से सैराब करते।

  17. لِّنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَمَن يُعْرِضْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِۦ يَسْلُكْهُ عَذَابًا صَعَدًا۝١٧

    Linaftinahum feehi waman yuʿrid ʿan thikri rabbihi yaslukhu ʿathaban saʿadan

    ताकि हम उसमें उनका परीक्षण करें। और जो अपने पालनहार की याद से विमुख होगा, वह उसे कड़ी यातना में दाख़िल करेगा।

  18. وَأَنَّ ٱلْمَسَـٰجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا۟ مَعَ ٱللَّهِ أَحَدًا۝١٨

    Waanna almasajida lillahi fala tadʿoo maʿa Allahi ahadan

    और यह कि मस्जिदें2 केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो।

    टिप्पणियाँ
    [2] मस्जिद का अर्थ सज्दा करने का स्थान है। भावार्थ यह है कि अल्लाह के सिवा किसी अन्य की इबादत तथा उसके सिवा किसी से प्रार्थना तथा विनय करना अवैध है।
  19. وَأَنَّهُۥ لَمَّا قَامَ عَبْدُ ٱللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا۟ يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا۝١٩

    Waannahu lamma qama ʿabdu Allahi yadʿoohu kadoo yakoonoona ʿalayhi libadan

    और यह कि जब अल्लाह का बंदा3 उसे पुकारता हुआ खड़ा हुआ, तो निकट था कि वे उनपर जत्थे बनकर टूट पड़ते।

    टिप्पणियाँ
    [3] अल्लाह के भक्त से अभिप्राय मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं। तथा भावार्थ यह है कि जिन्न तथा मनुष्य मिल कर क़ुर्आन तथा इस्लाम की राह से रोकना चाहते हैं।
  20. قُلْ إِنَّمَآ أَدْعُوا۟ رَبِّى وَلَآ أُشْرِكُ بِهِۦٓ أَحَدًا۝٢٠

    Qul innama adʿoo rabbee wala oshriku bihi ahadan

    आप कह दें : मैं तो केवल अपने पालनहार को पुकारता हूँ और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराता।

  21. قُلْ إِنِّى لَآ أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا۝٢١

    Qul innee la amliku lakum darran wala rashadan

    आप कह दें : निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न किसी भलाई का।

  22. قُلْ إِنِّى لَن يُجِيرَنِى مِنَ ٱللَّهِ أَحَدٌ وَلَنْ أَجِدَ مِن دُونِهِۦ مُلْتَحَدًا۝٢٢

    Qul innee lan yujeeranee mina Allahi ahadun walan ajida min doonihi multahadan

    आप कह दें : निश्चय मुझे कदापि कोई अल्लाह से नहीं बचा सकेगा4 और न मैं उसके सिवा कभी कोई शरण का स्थान पाऊँगा।

    टिप्पणियाँ
    [4] अर्थात यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ और वह मुझे यातना देना चाहे।
  23. إِلَّا بَلَـٰغًا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِسَـٰلَـٰتِهِۦ ۚ وَمَن يَعْصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَإِنَّ لَهُۥ نَارَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًا۝٢٣

    Illa balaghan mina Allahi warisalatihi waman yaʿsi Allaha warasoolahu fainna lahu nara jahannama khalideena feeha abadan

    परंतु (मैं तो केवल) अल्लाह के आदेश पहुँचाने और उसके संदेशों का (अधिकार रखता हूँ)। और जो अल्लाह तथा उसके रसूल की अवज्ञा करेगा, तो निश्चय उसी के लिए जहन्नम की आग है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहने वाले हैं।

  24. حَتَّىٰٓ إِذَا رَأَوْا۟ مَا يُوعَدُونَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ أَضْعَفُ نَاصِرًا وَأَقَلُّ عَدَدًا۝٢٤

    Hatta itha raaw ma yooʿadoona fasayaʿlamoona man adʿafu nasiran waaqallu ʿadadan

    यहाँ तक कि जब वे उस चीज़ को देख लेंगे, जिसका उनसे वादा किया जाता है, तो अवश्य जान लेंगे कि कौन है जो सहायक की दृष्टि से अधिक कमज़ोर है और जो संख्या में अधिक कम है?

  25. قُلْ إِنْ أَدْرِىٓ أَقَرِيبٌ مَّا تُوعَدُونَ أَمْ يَجْعَلُ لَهُۥ رَبِّىٓ أَمَدًا۝٢٥

    Qul in adree aqareebun ma tooʿadoona am yajʿalu lahu rabbee amadan

    आप कह दें : मैं नहीं जानता कि जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जाता है, वह निकट है अथवा मेरा पालनहार उसके लिए कोई अवधि निर्धारित करेगा?

  26. عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَىٰ غَيْبِهِۦٓ أَحَدًا۝٢٦

    ʿalimu alghaybi fala yuthhiru ʿala ghaybihi ahadan

    वही ग़ैब (प्रोक्ष) का जानने वाला है। वह अपने ग़ैब (प्रोक्ष) को किसी पर प्रकट नहीं करता।

  27. إِلَّا مَنِ ٱرْتَضَىٰ مِن رَّسُولٍ فَإِنَّهُۥ يَسْلُكُ مِنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِۦ رَصَدًا۝٢٧

    Illa mani irtada min rasoolin fainnahu yasluku min bayni yadayhi wamin khalfihi rasadan

    सिवाय किसी रसूल के, जिसे वह पसंद कर ले। तो निःसंदेह वह उसके आगे तथा उसके पीछे पहरेदार नियुक्त कर देता है।5

    टिप्पणियाँ
    [5] अर्थात ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान तो अल्लाह ही को है। किंतु यदि धर्म के विषय में कुछ परोक्ष की बातों की वह़्य अपने किसी रसूल की ओर करता है, तो फ़रिश्तों द्वारा उसकी रक्षा की व्यवस्था भी करता है ताकि उसमें कुछ मिलाया न जा सके। रसूल को जितना ग़ैब का ज्ञान दिया जाता है, वह इस आयत से उजागर हो जाता है। फिर भी कुछ लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पूरे ग़ैब का ज्ञानी मानते हैं। और आप को गुहारते और सब जगह उपस्थित कहते हैं। और तौह़ीद को आघात पहुँचा कर शिर्क करते हैं।
  28. لِّيَعْلَمَ أَن قَدْ أَبْلَغُوا۟ رِسَـٰلَـٰتِ رَبِّهِمْ وَأَحَاطَ بِمَا لَدَيْهِمْ وَأَحْصَىٰ كُلَّ شَىْءٍ عَدَدًۢا۝٢٨

    Liyaʿlama an qad ablaghoo risalati rabbihim waahata bima ladayhim waahsa kulla shayin ʿadadan

    ताकि वह जान ले कि उन्होंने वास्तव में अपने पालनहार के संदेश6 पहुँचा दिए हैं। और उसने उन सभी चीज़ों को घेर रखा है, जो उनके पास हैं और प्रत्येक वस्तु को गिन रखा है।

    टिप्पणियाँ
    [6] अर्थात वह रसूलों की दशा को जानता है। उसने प्रत्येक चीज़ को गिन रखा है, ताकि रसूलों के संदेश पहुँचाने में कोई कमी-बेशी न हो। इसलिए लोगों को रसूलों की बातें मान लेनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सूरह जिन्न के नाम का मतलब क्या है?

जिन्न का मतलब "जिन्न" है।

सूरह जिन्न किस पारे में है?

सूरह जिन्न पारा 29 में है।

सूरह जिन्न में कितनी आयतें हैं?

सूरह जिन्न में 28 आयतें हैं।

सूरह जिन्न मक्की है या मदनी?

सूरह जिन्न मक्की सूरह है।

सूरह जिन्न क़ुरआन की कौन-सी सूरह है?

यह क़ुरआन की 72वीं सूरह है।

स्रोत

  • Arabic text: Tanzil Quran Text (Uthmani) (Tanzil Project, CC BY 3.0), reproduced without changes.
  • Translation: Azizul Haq Al-Omari, from QuranEnc.com, version 1.1.5, reproduced without changes.
  • Transliteration: Tanzil.net English transliteration.
  • Recitation: Mishary Rashid Alafasy, via QuranicAudio.com and EveryAyah.com.
  • Word by word: recordings and meanings from Quran.com (Quran Foundation), played when you tap a word.
  • Madinah and IndoPak fonts (Settings): the text in those scripts and their fonts come from the Quran Foundation (Quran.com); the Madinah font is the King Fahd Glorious Quran Printing Complex's Uthmanic Hafs font.

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